बच्चों को प्रकृति, पर्यावरण, पौधों और पक्षियों से जोड़ना जरूरी, शुरुआती उम्र में विकसित आदतें जीवनभर रहती हैं
काशीपुर (कशीपुर वार्ता)। एक ओंकार एकेडमी काशीपुर के चेयरमैन सुखविंदर सिंह ने कहा कि किंडरगार्टन में प्रवेश के समय बच्चा अपनी सबसे सहज और प्राकृतिक अवस्था में होता है। यही उम्र उसके व्यवहार, आदतों और सीखने की बुनियादी क्षमता के विकास की होती है। ऐसे में बच्चों पर अकादमिक शिक्षा का अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उनकी मूलभूत, प्राकृतिक एवं व्यवहारिक कौशल विकसित करने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
सुखविंदर सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चे मोबाइल फोन, टेलीविजन और कार्टून आदि में अधिक समय व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें प्रकृति और वास्तविक वातावरण से जोड़ना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। बच्चों को यह समझाने की आवश्यकता है कि मौसम में परिवर्तन कैसे होता है, पौधे किस प्रकार विकसित होते हैं और पक्षियों तथा अन्य जीव-जंतुओं का प्राकृतिक पर्यावरण में क्या महत्व है। प्रकृति के साथ जुड़ाव बच्चों में संवेदनशीलता और समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि किंडरगार्टन स्तर पर बच्चों को केवल इस आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए कि उन्होंने कितने शब्द याद किए, कितनी टेबल सीखी या कितनी शैक्षणिक जानकारी हासिल कर ली। अभिभावकों में भी बच्चों की पढ़ाई को लेकर एक-दूसरे से तुलना करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि शुरुआती वर्षों में बच्चे के व्यवहार, अनुशासन, कृतज्ञता, सामाजिक समझ और प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता जैसे कौशल विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि छह वर्ष तक की उम्र बच्चे के विकास की महत्वपूर्ण अवस्था है। इस दौरान उसे सीखने, व्यवहार और वातावरण को समझने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। उनका मानना है कि जब बच्चे की बुनियादी और व्यवहारिक क्षमताएं मजबूत होती हैं, तब आगे की औपचारिक शिक्षा को आत्मसात करना उसके लिए अधिक सहज हो जाता है।
सुखविंदर सिंह ने कहा कि कई देशों की शिक्षा व्यवस्था में भी प्रारंभिक वर्षों में बच्चों के समग्र विकास पर विशेष जोर दिया जाता है। वहां बच्चों को प्रकृति, व्यवहार, सामाजिकता और दैनिक जीवन से जुड़े कौशल सिखाने के बाद औपचारिक अकादमिक शिक्षा की ओर आगे बढ़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि किंडरगार्टन का उद्देश्य केवल बच्चे को किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि उसे जीवन के लिए तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों और शिक्षकों से अपील की कि बच्चों की तुलना करने और उन पर पढ़ाई का दबाव बढ़ाने के बजाय उन्हें सीखने के लिए सहज वातावरण दें। बच्चों को प्रकृति के करीब लाएं, पौधों और पक्षियों से परिचित कराएं तथा उनमें कृतज्ञता, संवेदनशीलता और अच्छे व्यवहार की आदत विकसित करें। यही बुनियादी कौशल आगे चलकर उनके व्यक्तित्व निर्माण की मजबूत नींव तैयार करेंगे।


