एक माँ, एक शिशु और एक समन्वित देखभाल पहल का भव्य शुभारंभ
देहरादून (काशीपुर वार्ता)। मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य को सुदृढ़ एवं समन्वित बनाने की दिशा में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) एवं फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) द्वारा “एक माँ, एक शिशु और एक समन्वित देखभाल” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण संयुक्त शैक्षणिक एवं कार्यान्वयन पहल का भव्य शुभारंभ किया गया। इस पहल का उद्देश्य माँ और नवजात शिशु को केंद्र में रखकर एकीकृत एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। कार्यक्रम में 700 से अधिक प्रतिभागियों का पंजीकरण हुआ, जो इस पहल की व्यापक स्वीकार्यता और आवश्यकता को दर्शाता है। आयोजन में देश एवं राज्य के प्रतिष्ठित चिकित्सा विशेषज्ञों की गरिमामयी उपस्थिति रही। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. अशोक के. देओरारी एवं डॉ. जया चतुर्वेदी ने मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखते हुए समन्वित चिकित्सा प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया। इस अवसर पर एफओजीएसआई की स्टेट प्रेसिडेंट डॉ. अनुपमा फ्यूटेला, डॉ. राधिका रतूड़ी तथा आईएपी उत्तराखंड के स्टेट प्रेसिडेंट डॉ. रवि सहोता विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. अनुपमा फ्यूटेला ने कहा कि “माँ की सुरक्षा ही स्वस्थ शिशु का आधार है और इसके लिए समन्वित प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।” वहीं डॉ. रवि सहोता ने इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि ‘एक माँ, एक शिशु और एक देखभाल’ मॉडल के साथ टीम-आधारित चिकित्सा प्रणाली को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। अंत में डॉ. राजलक्ष्मी मुंधरा ने सभी प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त किया।
प्रशिक्षण, एकरूप प्रोटोकॉल व जमीनी कार्ययोजना पर विशेष जोर
मातृ-शिशु स्वास्थ्य सुधार की दिशा में ठोस कदम

देहरादून (काशीपुर वार्ता)। आईएपी अध्यक्ष डॉ. रवि सहोता ने बताया कि मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने की दिशा में कार्यक्रम के दौरान भविष्य की विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। डॉ. राकेश कुमार ने प्रशिक्षण, प्रोटोकॉल की एकरूपता तथा परिणाम आधारित कार्यप्रणाली को केंद्र में रखते हुए व्यापक रोडमैप रखा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में प्रभावी समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। डॉ. आरती ने इस पहल की व्यवहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए इसके संभावित सकारात्मक प्रभावों को रेखांकित किया और इसे जमीनी स्तर पर लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार आगामी समय में सात मासिक शैक्षणिक व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही जमीनी स्तर पर व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित किए जाएंगे, जिनसे स्वास्थ्यकर्मियों, नर्सों, पीडियाट्रिशियन एवं गायनेकोलॉजिस्ट की दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इस संयुक्त पहल का मुख्य उद्देश्य मातृ मृत्यु दर एवं नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) में कमी लाना है। साथ ही एक समान एवं वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर समन्वय स्थापित करना भी प्राथमिक लक्ष्य रखा गया है। यह पहल केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक स्वास्थ्य आंदोलन के रूप में उभर रही है, जो माँ और शिशु के सुरक्षित एवं स्वस्थ भविष्य की दिशा में एक मजबूत पहल साबित होगी।
