प्राग के अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड का परचम, डॉ. रवि सहोता के शोध को मिली वैश्विक पहचान

“हर डायपर एक कहानी कहता है” मॉडल ने नवजात चिकित्सा में दी नई दिशा, सीमित संसाधनों में प्रभावी समाधान का उदाहरण

काशीपुर/प्राग (काशीपुर वार्ता)। उत्तराखंड के लिए गर्व और सम्मान का क्षण उस समय आया जब काशीपुर के प्रतिष्ठित बाल एवं नवजात रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि सहोता ने चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय बाल एवं नवजात चिकित्सा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) उत्तराखंड के अध्यक्ष डॉ. सहोता को इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में इंटरनेशनल फैकल्टी के रूप में आमंत्रित किया गया, जो उनके उत्कृष्ट योगदान और विशेषज्ञता का प्रमाण है। इस सम्मेलन में विश्वभर से नवजात चिकित्सा के क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञ, शोधकर्ता और चिकित्सक शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान नवजात शिशुओं की देखभाल, संक्रमण नियंत्रण, पोषण और नई चिकित्सा तकनीकों पर गहन विचार-विमर्श किया गया।

इसी मंच पर डॉ. सहोता ने “हर डायपर एक कहानी कहता है” विषय पर अपना अभिनव शोध प्रस्तुत किया, जिसने उपस्थित विशेषज्ञों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। डॉ. सहोता द्वारा विकसित “रोज़ाना डायपर जांच (डीडीए)” मॉडल नवजात गहन चिकित्सा इकाई ( एनआईसीयू) में उपयोग होने वाला एक अनूठा और व्यवहारिक तरीका है। यह मॉडल नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य संकेतों को सरल अवलोकनों के माध्यम से समझने और समय रहते संभावित जटिलताओं का पता लगाने में मदद करता है। उन्होंने अपने शोध में बताया कि किस प्रकार डायपर के नियमित निरीक्षण के जरिए शिशु की स्थिति, संक्रमण की संभावना और पोषण संबंधी संकेतों का आकलन किया जा सकता है। यह पद्धति न केवल सरल है, बल्कि अत्यधिक प्रभावी भी सिद्ध हो रही है।

डॉ. सहोता के शोध में कई महत्वपूर्ण और सकारात्मक परिणाम आये सामने

काशीपुर (काशीपुर वार्ता। नवजात शिशुओं में “देर से होने वाला सेप्सिस (एलओएस)” के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई कम वजन वाले शिशुओं में वजन बढ़ने की दर में स्पष्ट सुधार हुआ। शिशुओं में फीडिंग जल्दी शुरू होने और स्थिरता बनाए रखने में सहायता मिली। और नर्सिंग स्टाफ की कार्यकुशलता, सतर्कता और निर्णय क्षमता में वृद्धि हुई। यह अध्ययन दर्शाता है कि यदि सामान्य क्लिनिकल संकेतों को व्यवस्थित ढंग से उपयोग में लाया जाए, तो गंभीर संक्रमणों को समय रहते रोका जा सकता है और नवजात शिशुओं की जीवन रक्षा की संभावना को काफी बढ़ाया जा सकता है। इस अवसर पर डॉ. रवि सहोता ने कहा, “नवजात शिशुओं की देखभाल में छोटी-छोटी क्लिनिकल जानकारियां भी जीवन बचाने का माध्यम बन सकती हैं। हमारा प्रयास है कि ऐसे मॉडल्स को वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए, ताकि अधिक से अधिक शिशुओं की जान बचाई जा सके।”

सहोता सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की बड़ी उपलब्धि, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने की सराहना

काशीपुर (काशीपुर वार्ता)। यह महत्वपूर्ण शोध काशीपुर स्थित सहोता सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में विकसित किया गया, जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। इस उपलब्धि से न केवल अस्पताल की प्रतिष्ठा बढ़ी है, बल्कि यह देश के अन्य चिकित्सा संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गया है। डॉ. सहोता की यह उपलब्धि भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर है। यह दर्शाती है कि समर्पण, नवाचार और वैज्ञानिक सोच के साथ भारत वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है और भविष्य में और भी महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तैयार है। सम्मेलन में उपस्थित वैश्विक विशेषज्ञों ने डॉ. सहोता के इस मॉडल को अत्यंत उपयोगी और व्यावहारिक बताया। विशेष रूप से कम संसाधनों वाले देशों के लिए इसे एक प्रभावी समाधान के रूप में सराहा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ-साथ नवजात मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कई विशेषज्ञों ने इसे नवजात देखभाल के क्षेत्र में एक “गेम चेंजर” बताते हुए इसे व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ रवि सहोता की इस उपलब्धि ने उत्तराखंड सहित पूरे देश का गौरव बढ़ाया है और यह साबित किया है कि भारतीय चिकित्सक सीमित संसाधनों में भी विश्वस्तरीय नवाचार करने की क्षमता रखते हैं।

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