स्वीकार्यता, समय पर पहचान और सहयोग से हर बच्चा बन सकता है आत्मनिर्भर

काशीपुर (काशीपुर वार्ता)। विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर पैगिया हॉस्पिटल की सुप्रसिद्ध नवजात एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नम्रता अग्रवाल का कहना है कि हर बच्चा अपने भीतर अनगिनत संभावनाएँ और सपने लेकर जन्म लेता है। उनकी मुस्कान में एक उज्ज्वल भविष्य की झलक छिपी होती है। आवश्यकता है तो बस उन्हें समझने, स्वीकार करने और सही दिशा देने की। जब समाज संवेदनशील बनता है, तभी बच्चे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं और अपनी क्षमताओं को पहचान पाते हैं। आज के समय में बच्चों के मानसिक और न्यूरो-विकासात्मक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी क्रम में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभरा है। सामान्यतः “ऑटिज्म” के नाम से जाना जाने वाला यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि मस्तिष्क के विकास का एक अलग पैटर्न है, जो बच्चों के संचार, सामाजिक संपर्क और व्यवहार को प्रभावित करता है। “स्पेक्ट्रम” शब्द यह दर्शाता है कि इसके लक्षण और उनकी तीव्रता हर बच्चे में अलग-अलग हो सकती है। उन्होंने बताया कि ऑटिज्म के शुरुआती संकेत बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं। बच्चे आँखों से संपर्क कम करते हैं, बोलने में देरी हो सकती है और वे अपने ही संसार में खोए रहते हैं। कई बार उन्हें सामाजिक संकेत समझने में कठिनाई होती है। यदि समय रहते इन लक्षणों की पहचान कर उचित हस्तक्षेप न किया जाए, तो आगे चलकर बच्चे चिंता, अवसाद या अन्य मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। हालांकि, सकारात्मक पहलू यह है कि सही समय पर सहयोग, प्रशिक्षण और अनुकूल वातावरण मिलने पर इन बच्चों में उल्लेखनीय सुधार संभव है। अर्ली इंटरवेंशन (प्रारंभिक हस्तक्षेप) के माध्यम से बच्चे की क्षमताओं को सही दिशा दी जा सकती है, जिससे वह अपनी संभावनाओं को बेहतर ढंग से विकसित कर सके। इस दिशा में परिवार, स्कूल और समाज की संयुक्त भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। डॉ. नम्रता अग्रवाल का कहना है कि ऑटिज्म कोई कमी नहीं, बल्कि विविधता का एक रूप है। जरूरत है सही जानकारी, संवेदनशीलता और समय पर सहायता की। जब समाज मिलकर सहयोग करता है, तो हर बच्चा अपनी अनूठी पहचान के साथ आगे बढ़ सकता है।
ऑटिज्म को समझें, संवेदनशील समाज से ही सजेगा बच्चों भविष्य: डॉ. नम्रता अग्रवाल

काशीपुर (काशीपुर वार्ता)। सुप्रसिद्ध नवजात एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नम्रता अग्रवाल ने कहा कि विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि केवल जागरूकता फैलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में स्वीकार्यता और समावेश को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म से जुड़े बच्चों को सहानुभूति नहीं, बल्कि समझ और समान अवसरों की आवश्यकता होती है। जब परिवार, स्कूल और समाज मिलकर सकारात्मक वातावरण प्रदान करते हैं, तब ऐसे बच्चे अपनी क्षमताओं को पहचानते हुए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं। जरूरी है कि हम उनके व्यवहार को समझें, उन्हें अपनाएं और उनकी विशेषताओं को सम्मान दें। समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह भेदभाव को खत्म कर समावेशी सोच अपनाए। तभी एक ऐसा वातावरण तैयार होगा, जहां हर बच्चा—चाहे वह किसी भी स्पेक्ट्रम पर हो—सम्मान, समझ और समान अवसरों के साथ अपना जीवन बेहतर ढंग से जी सके।
